Friday, December 12, 2008

नर हो, न निराश करो मन को... (मैथिली शरण गुप्त)

रचनाकार : मैथिली शरण गुप्त

विशेष नोट : कर्म करने की प्रेरणा देती यह कविता भी मैंने शायद छठी या सातवीं कक्षा में ही पढ़ी थी...

कुछ काम करो, कुछ काम करो,
जग में रह के निज नाम करो...
यह जन्म हुआ, किस अर्थ, अहो!
समझो, जिसमें यह व्यर्थ न हो...

कुछ तो उपयुक्त करो तन को,
नर हो, न निराश करो मन को...

संभलो कि सुयोग न जाए चला,
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला...
समझो जग को न निरा सपना,
पथ आप प्रशस्त करो अपना...

अखिलेश्वर है अवलम्बन को,
नर हो, न निराश करो मन को...

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहां,
फिर जा सकता वह सत्त्व कहां!
तुम स्वत्त्व सुधा रसपान करो,
उठ के अमरत्व विधान करो...

दवरूप रहो भव कानन को,
नर हो, न निराश करो मन को...

निज गौरव का नित ज्ञान रहे,
हम भी कुछ हैं, यह ध्यान रहे...
सब जाय अभी, पर मान रहे,
मरणोत्तर गुंजित गान रहे...

कुछ हो, न तजो निज साधन को,
नर हो, न निराश करो मन को...

3 comments:

  1. This poem inspire me when I was in down fall in my life. And really this poem changed my life. I always tell this poem to other.

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  2. This poem inspire me when I was in down fall in my life. And really this poem changed my life. I always tell this poem to other .

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