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Monday, April 02, 2012

क-ख-ग की कविता... (विवेक रस्तोगी)

विशेष नोट : फेसबुक पर एक मित्र के मित्र श्री रत्नेश त्रिपाठी ने आज बच्चों के लिए हिन्दी का कायदा बनाने की कोशिश की, और दो लाइनें लिखकर भेजीं... बस, फिर क्या था, मेरे खुराफाती दिमाग में कीड़ा कुलबुलाया, और मैंने अपनी तरफ से पूरा कर डाला... बताइए, कैसा रहा...?

सबसे पहले मुलाहिज़ा फरमाएं, ये है रत्नेश जी की कविता...

क की कोयल कूक रही है...
ख खरगोश खड़ा है...
ग की गइया बैठी भइया...
घ क घड़ा भरा है...
आगे देखो ड़. खाली... सभी बजाओ मिलकर ताली...

च से चमके चंदा मामा...
छ क छप्पर छाये...
ज की बनी जलेबी रानी...
झ झंडा फहराए...
आगे देखो ञ खाली... सभी बजाओ मिलकर ताली...

और अब मेरा लिखा काव्यात्मक कायदा...

'क' से कोयल कूक रही, 'ख' से खरगोश खड़ा है...
'ग' से गाय रंभाती है, 'घ' से घड़ा भरा है...

'ङ' खाली से कुछ न शुरू हो, देखो, यहीं पड़ा है...

'च' से चंदा मामा चमका, 'छ' से छप्पर छाया...
'ज' से जलेबी मीठी-मीठी, 'झ' झंडा फहराया...
'ञ' खाली से भी न बने कुछ, मैं तो अब चकराया...

'ट' से लाल टमाटर खाया, 'ठ' से ठोकर खाई...
'ड' से डमरू बजता, भैया, 'ढ' ढोलक बजवाई...
'ण' से भी कुछ शुरू न होता, है अजीब यह भाई...

'त' से तीर रहे तरकश में, 'थ' से थरमस बनता...
'द' से दादा-दादी होते, 'ध' से धनुष है तनता...
जोर से बजता 'न' से नगाड़ा, बच्चा-बच्चा सुनता...

'प' से उड़ती पतंग हवा में, 'फ' से खिलते फूल...
'ब' से बकरी मैं-मैं करती, जब भी उड़ती धूल...
'भ' से भालू, 'म' से मछली, इनको भी मत भूल...

'य' से यज्ञ किया साधु ने, 'र' से रस्सी बांधी...
'ल' से लोटा होता, 'व' से वायु की चलती आंधी...

'श' से शलगम उगती है, 'ष' से षट्कोण है बनता...
'स' से सरगम बने, जो 'ह' से हारमोनियम बजता...

'क्ष' से क्षत्रिय घूमे लेकर, हाथ में 'त्र' से त्रिशूल...

'ज्ञ' से ज्ञानी जो भी पढ़ाएं, कभी न उसको भूल...

Thursday, September 08, 2011

सूरज, चांद और अखबार... (विवेक रस्तोगी)

विशेष नोट : मेरे विचार में छोटे-छोटे बच्चों को आसपास की चीज़ों के बारे में जानकारी देने और सिखाने के लिए कविताएं बेहतरीन ज़रिया होती हैं... छोटी-छोटी लयबद्ध कविताएं बच्चे स्वभावतः जल्दी याद कर लेते हैं, सो, इस बार प्रयास किया है, तीन छोटी-छोटी कविताएं लिखकर, उनके माध्यम से सूरज, चांद और अखबार के बारे में सिखाने का...

सूरज


दिन भर देता हमें रोशनी,
सबको मार्ग दिखाता है...
शाम ढले यह छिप जाता है,
सूरज यह कहलाता है...
इसके चारों तरफ हमारी,
धरती चक्कर काटती है...
इस तारे में, आग भरी है,
धूप हमें यह बांटती है...

चांद


रात हुई, और गगन को देखा,
पाया एक अनूठा मंजर...
तारों में एक गेंद पड़ी थी,
चमक रही थी, वह जमकर...
किसी रात यह छोटी होती,
किसी रात में बिल्कुल गोल...
किसी रात यह नज़र न आती,
चंदा मामा इसको बोल...

अखबार


सुबह-सवेरे, आ जाता है,
खबरें लेकर, दुनियाभर की...
कहलाता है यह अखबार,
तस्वीरें लाता सुन्दर-सी...
पापा उठकर सुबह-सवेरे,
पढ़ते हैं, सबसे पहले...
कहते हैं, सुधरेगी भाषा,
बच्चे गर इसको पढ़ लें...

Saturday, June 04, 2011

प्यारी निष्ठा... (रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक')

विशेष नोट : श्री रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक' द्वारा उनकी पोती प्राची के लिए रचित कविता 'प्यारी प्राची' को मैंने पिछले वर्ष अपने ब्लॉग पर प्रकाशित किया था, और बेटी के प्यार में पड़कर उसमें उनकी पोती का नाम क्षमाप्रार्थना के साथ अपनी बेटी के नाम से बदल दिया था... आज शास्त्री जी ने मेरी बेटी के लिए नई कविता लिखकर प्रेषित की है, उनका हार्दिक धन्यवाद, एक पिता के रूप में... आप सब भी पढ़कर आनंद लें... वैसे इस कविता के प्रकाशन के साथ ही उनकी मूल कविता में उनकी पोती प्राची का ही नाम लगा दिया है...


प्यारी-प्यारी गुड़िया जैसी,
बिटिया तुम हो कितनी प्यारी...
मोहक है मुस्कान तुम्हारी,
घर-भर की तुम राजदुलारी...

नए-नए परिधान पहनकर,
सबको बहुत लुभाती हो...
अपने मन का गाना सुनकर,
ठुमके खूब लगाती हो...

निष्ठा तुम प्राची जैसी ही,
चंचल-नटखट बच्ची हो...
मन में मैल नहीं रखती हो,
देवी जैसी सच्ची हो...

दिन-भर के कामों से थककर,
जब घर वापिस आता हूं...
तुमसे बातें करके सारे,
कष्ट भूल मैं जाता हूं...

मेरे घर-आंगन की तुम तो,
नन्हीं कलिका हो सुरभित...
हंसते-गाते देख तुम्हें,
मन सबका हो जाता हर्षित...

Friday, June 03, 2011

छुट्टियों में दिल्ली की सैर... (विवेक रस्तोगी)

विशेष नोट : गर्मियां आईं, स्कूलों में छुट्टियां हुईं, और बच्चे दिल्ली पहुंचे, यह तो हर बार होता ही है... हर बार उन्हें कुछ न कुछ नया सिखाता भी हूं, सो, इस बार भी एक कविता लिख दी है उनके लिए... आप लोग भी मुलाहिज़ा फरमाएं...
 

छुट्टी थी जब स्कूल में अपने, सब कुछ हुआ था बंद,
दिल्ली जाकर मैं और निष्ठा, रहे थे सबके संग...

दादा-दादी, चाचा-चाची, सबका मिला था प्यार,
रोज़ किया था हल्ला-गुल्ला, रोज़ ही चीख-पुकार...

सॉफ्टी थी, और शरबत भी था, था रबड़ी का दोना,
सबके संग खाया था सब कुछ, कोई न रोना-धोना...

लोटस टेम्पल, लालकिला भी देखा था इस बार,
कुतुब दिखाया पापा ने, दिलवाई खिलौना कार...

चिड़ियाघर में सभी जानवर, देखे हमने मिलकर,
शेर भी देखा, हाथी भी था, और था मोटा बंदर...

मैट्रो की भी सैर कराई, बहुत मज़ा था आया,
इंडिया गेट पर बोट में बैठे, सबका मन हर्षाया...

पार्क में लेकर गई थीं मम्मी, ढेरों थे वहां झूले,
वहां किया था हल्ला जमकर, अब तक हम न भूले...

कोई नहीं थी चिन्ता हमको, कोई किया न काम,
सारे दिन करते थे मस्ती, खेल-कूद, आराम...

चिड़िया... (श्यामसुन्दर अग्रवाल)

विशेष नोट : हर साल की तरह छुट्टियों में बच्चे इस बार भी मेरे पास दिल्ली पहुंच चुके हैं, सो, उन्हें कुछ नया सिखाने की मेरी कवायद भी हमेशा की तरह शुरू हो गई है, जिसका परिणाम श्री श्यामसुन्दर अग्रवाल द्वारा रचित इस शिक्षाप्रद बाल कविता के रूप में आपके सामने है... भारतीय भाषाओं में रचित काव्य के संकलन के लिए प्रसिद्ध www.kavitakosh.org के अनुसार श्री अग्रवाल का जन्म पंजाब के कोटकपुरा में हुआ था... श्री अग्रवाल हिन्दी और पंजाबी भाषा में कविताएं रचने के अतिरिक्त कहानियां और लघुकथाएं लिखने, उनके सम्पादन तथा अनुवाद करने के लिए भी जाने जाते हैं... श्री अग्रवाल पिछले 21 वर्ष से लघुकथाओं की पंजाबी त्रैमासिक पत्रिका 'मिन्नी' के संयुक्त सम्पादक भी हैं... 
 
 
 सुबह-सवेरे आती चिड़िया,
आकर मुझे जगाती चिड़िया...
ऊपर बैठ मुंडेर पर,
चीं-चीं, चूं-चूं गाती चिड़िया...

जाना है, नहीं स्कूल उसे,
न ही दफ़्तर जाती चिड़िया...
फिर भी सदा समय से आती,
आलस नहीं दिखाती चिड़िया...

थोड़ा-सा चुग्गा लेकर भी,
दिन-भर पंख फैलाती चिड़िया...
इससे सेहत ठीक है रखती,
नहीं दवाई खाती चिड़िया...

छोटी-सी है, फिर भी बच्चों,
बातें कई सिखाती चिड़िया...
रखो सदा ध्यान समय का,
सबको पाठ पढ़ाती चिड़िया...

Friday, May 20, 2011

आई रेल, आई रेल... (रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

विशेष नोट : गर्मी की छुट्टियों के दौरान बच्चों को कुछ नया सिखाने के उद्देश्य से कविताकोश.ओआरजी पर आया था, और वहां रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी की लिखी यह कविता मिली... अच्छी लगी, सो, आप लोग भी पढ़ लें...


 धक्का-मुक्की, रेलम-पेल,
आई रेल, आई रेल...

इंजन चलता सबसे आगे,
पीछे-पीछे डिब्बे भागे...

हॉर्न बजाता, धुआं छोड़ता,
पटरी पर यह तेज़ दौड़ता...

जब स्टेशन आ जाता है,
सिग्नल पर रुक जाता है...

जब तक बत्ती लाल रहेगी,
इसकी ज़ीरो चाल रहेगी...

हरा रंग जब हो जाता है,
तब आगे को बढ़ जाता है...

बच्चों को यह बहुत सुहाती,
नानी के घर तक ले जाती...

छुक-छुक करती आती रेल,
आओ मिलकर खेलें खेल...

धक्का-मुक्की, रेलम-पेल,
आई रेल, आई रेल...

Monday, May 09, 2011

लालाजी, लालाजी, एक लड्डू दो... (अज्ञात)

विशेष नोट : रविवार, 8 मई, 2011 को बरेली से दिल्ली लौटते वक्त ट्रेन में एक बच्चा मिला, जिसका नाम नोमान है, वह दिल्ली में ही दिलशाद गार्डन के ग्रीनवे स्कूल की पहली क्लास (1 D) में पढ़ता है... उसने रास्ते में एक कविता सुनाई, जो मुझे अपने बच्चों के लिए भी अच्छी लगी, सो, आप लोग भी मुलाहिज़ा फरमाएं...

बच्चा : लालाजी, लालाजी, एक लड्डू दो...

लालाजी : लड्डू चाहिए तो चार आने दो...

बच्चा : लालाजी, लालाजी, पैसे नहीं...

लालाजी : पैसे नहीं, तो लड्डू नहीं...

बच्चा : लालाजी, लालाजी, इक बात कहूं...
बच्चा : आपकी मूंछें बड़ी, प्यारी है...

लालाजी : बेटाजी, बेटाजी, मेरे पास तो आओ...
लालाजी : इक लड्डू छोड़ो, तुम दो लड्डू खाओ...

बच्चा : लालाजी, लालाजी, पॉकेट्स हैं चार...
बच्चा : चारों भर जाएं तो सबको नमस्कार...

Monday, March 28, 2011

बतूता का जूता... (सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

विशेष नोट : यह बाल कवि‍ता स्वर्गीय श्री सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की रचना है... मैं बचपन में बहुत-सी बाल पत्रिकाएं पढ़ा करता था, जिनमें 'पराग' भी शामिल थी... श्री सक्सेना का नाम पहली बार उसी पत्रिका में सम्पादक के तौर पर पढ़ा था... अतिरिक्त जानकारी के तौर पर KavitaKosh.org से श्री सक्सेना का परिचय उपलब्ध करवा रहा हूं... श्री सक्सेना का जन्म बस्ती जिले के एक गांव में हुआ, तथा उच्च शिक्षा काशी में... उन्होंने पहले अध्यापन किया, फिर आकाशवाणी से जुड़े... बाद में वह 'दिनमान के सहायक सम्पादक बने... श्री सक्सेना तीसरा सप्तक के कवियों में प्रमुख हैं, तथा इनकी रचनाएं रूसी, जर्मन, पोलिश तथा चेक भाषाओं में अनूदित हैं... इनके मुख्य काव्य-संग्रह हैं : 'काठ की घंटियां', 'बांस का पुल', 'गर्म हवाएं', 'कुआनो नदी', 'जंगल का दर्द', 'एक सूनी नाव', 'खूंटियों पर टंगे लोग' तथा 'कोई मेरे साथ चले'... इन्होंने उपन्यास, कहानी, गीत-नाटिका तथा बाल-काव्य भी लिखे हैं, तथा श्री सक्सेना को साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था...


ब्नबतूता... पहन के जूता...
निकल पड़े तूफान में...
थोड़ी हवा नाक में घुस गई...
घुस गई थोड़ी कान में...

कभी नाक को... कभी कान को...
मलते इब्नबतूता...
इसी बीच में निकल पड़ा...
उनके पैरों का जूता...

उड़ते-उड़ते जूता उनका...
जा पहुंचा जापान में...
इब्नबतूता खड़े रह गए...
मोची की दुकान में...

Thursday, January 27, 2011

सुपरमैन हैं मेरे पापा... (वि‍वेक भटनागर)

विशेष नोट : यह युवा कवि‍ एवं पत्रकार वि‍वेक भटनागर द्वारा रचित बाल कवि‍ता है, जो अचानक ही इंटरनेट पर दिख गई, और अच्छी लगी, सो, आप लोग भी इसका आनंद लें...

 

सुपरमैन हैं मेरे पापा...
सुपरमैन हैं मेरे पापा...

अक्सर चीतों से भिड़ जाते...
शेरों से भी न घबराते...
भालू से कुश्ती में जीते...
हाथी तक का दिल दहलाते...
मगरमच्छ का जबड़ा नापा...
सुपरमैन हैं मेरे पापा...

भूत-प्रेत भी उनसे डरते...
सारे उनकी सेवा करते...
सभी चुड़ैलें झाड़ू देतीं...
सारे राक्षस पानी भरते...
उनमें पापा का डर व्यापा...
सुपरमैन हैं मेरे पापा...

आसमान तक सीढ़ी रखते...
खूब दूर तक चढ़ते जाते...
इंद्रलोक में जाकर वह तो...
इंद्रदेव से हाथ मिलाते...
उनसे डर इंद्रासन कांपा...
सुपरमैन हैं मेरे पापा...

वि‍वेक भटनागर जी की इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद मेरी फेसबुक मित्र, आदरणीय शरद जोशी जी की पुत्री तथा टीवी अभिनेत्री नेहा शरद ने इस कविता में कुछ जोड़ा, सो, वह भी प्रस्तुत है...

सुपरमैन हैं मेरे पापा...
मम्मी से थोड़ा घबराते...
उनको देख-देख हकलाते...
सिर झुकाकर ऐसे रहते,
जैसे मम्मी से शरमाते...
सुपरमैन हैं मेरे पापा...

Friday, November 26, 2010

प्यारी प्राची... (रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

विशेष नोट : मेरी बेटी निष्ठा को अपने सिर पर दुपट्टा ओढ़ने या साड़ी लपेटने का काफी शौक है, जबकि वह अभी तीन साल की भी नहीं हुई है... आज अचानक कविताकोश.ओआरजी पर रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी की लिखी यह कविता दिखी, तो अपने ब्लॉग पर ले आया हूं...

इतनी जल्दी क्या है बिटिया,
सिर पर पल्लू लाने की...
अभी उम्र है गुड्डे-गुड़ियों,
के संग समय बिताने की...

मम्मी-पापा तुम्हें देखकर,
मन ही मन हर्षाते हैं...
जब वे नन्ही-सी बेटी की,
छवि आंखों में पाते हैं...

जब आएगा समय सुहाना,
देंगे हम उपहार तुम्हें...
तन-मन-धन से सब सौगातें,
देंगे बारम्बार तुम्हें...

अम्मा-बाबा की प्यारी,
तुम सबकी राजदुलारी हो...
घर-आंगन की बगिया की,
तुम मनमोहक फुलवारी हो...

सबकी आंखों में बसती हो,
इस घर की तुम दुनिया हो...
प्राची, तुम हो बड़ी सलोनी,
इक प्यारी-सी मुनिया हो...

Friday, September 03, 2010

चांद एक दिन... (रामधारी सिंह 'दिनकर')

विशेष नोट : बच्चों के लिए यह कविता अच्छी रहेगी, मधुर भी है, और इसके जरिये उन्हें चंद्रमा की कला के बारे में भी जानकारी दी जा सकती है...

हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला...
सिलवा दो मां, मुझे, ऊन का मोटा एक झिंगोला...

सन-सन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूं...
ठिठुर-ठिठुरकर, किसी तरह यात्रा पूरी करता हूं...

आसमान का सफर, और यह मौसम है जाड़े का...
न हो अगर कुछ और, तो ला दो कुर्ता ही भाड़े का...

बच्चे की सुन बात, कहा माता ने, 'अरे सलोने'...
कुशल करे भगवान, लगे मत तुझको जादू-टोने...

जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूं...
एक नाप में, कभी नहीं तुझको देखा करती हूं...

कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा...
बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा...

घटता-बढ़ता रोज, किसी दिन ऐसा भी करता है...
नहीं किसी की भी आंखों को दिखलाई पड़ता है...

अब तू ही बता यह, नाप तेरी किस रोज लिवाए...
सी दें एक झिंगोला, जो हर रोज बदन में आए...

Thursday, July 22, 2010

पानी और धूप... (सुभद्राकुमारी चौहान)

विशेष नोट : सुभद्राकुमारी चौहान द्वारा रचित कई कविताएं हम सबने अपने स्कूली दिनों में पढ़ी हैं, परंतु यह कविता मुझे हाल ही में इंटरनेट पर कविताओं की एक वेबसाइट पर दिखी... अच्छी लगी, सो, आपके लिए भी प्रस्तुत है...

अभी अभी थी धूप, बरसने लगा कहां से यह पानी...
किसने फोड़ घड़े बादल के, की है इतनी शैतानी...

सूरज ने क्‍यों बंद कर लिया, अपने घर का दरवाज़ा...
उसकी मां ने भी क्‍या उसको, बुला लिया कहकर आजा...

ज़ोर-ज़ोर से गरज रहे हैं, बादल हैं किसके काका...
किसको डांट रहे हैं, किसने, कहना नहीं सुना मां का...

बिजली के आंगन में अम्‍मा, चलती है कितनी तलवार...
कैसी चमक रही है, फिर भी, क्‍यों खाली जाते हैं वार...

क्‍या अब तक तलवार चलाना, मां, वे सीख नहीं पाए...
इसीलिए क्‍या आज सीखने, आसमान पर हैं आए...

एक बार भी, मां, यदि मुझको, बिजली के घर जाने दो...
उसके बच्‍चों को, तलवार चलाना, सिखला आने दो...

खुश होकर तब बिजली देगी, मुझे चमकती-सी तलवार...
तब मां, कर न कोई सकेगा, अपने ऊपर अत्‍याचार...

पुलिसमैन, अपने काका को, फिर न पकड़ने आएंगे...
देखेंगे तलवार, दूर से ही, वे सब डर जाएंगे...

अगर चाहती हो, मां, काका जाएं अब न जेलखाना...
तो फिर बिजली के घर मुझको, तुम जल्‍दी से पहुंचाना...

काका जेल न जाएंगे अब, तुझे मंगा दूंगी तलवार...
पर बिजली के घर जाने का, अब मत करना कभी विचार...

Thursday, July 15, 2010

यह कदम्ब का पेड़... (सुभद्राकुमारी चौहान)

विशेष नोट : सुभद्राकुमारी चौहान द्वारा रचित कई कविताएं हम सबने अपने स्कूली दिनों में पढ़ी हैं, परंतु यह कविता मुझे हाल ही में इंटरनेट पर कविताओं की एक वेबसाइट पर दिखी... अच्छी लगी, सो, आपके लिए भी प्रस्तुत है...

यह कदम्ब का पेड़, अगर मां, होता यमुना तीरे...
मैं भी उस पर बैठ, कन्हैया बनता, धीरे-धीरे...

ले देतीं यदि मुझे बांसुरी, तुम दो पैसे वाली...
किसी तरह नीची हो जाती, यह कदम्ब की डाली...

तुम्हें नहीं कुछ कहता, पर मैं, चुपके-चुपके आता...
उस नीची डाली से अम्मा, ऊंचे पर चढ़ जाता...

वहीं बैठ फिर, बड़े मजे से, मैं बांसुरी बजाता...
अम्मा-अम्मा, कह वंशी के स्वर में, तुम्हे बुलाता...

सुन मेरी बंसी, मां, तुम कितना खुश हो जातीं...
मुझे देखने काम छोड़कर, तुम बाहर तक आतीं...

तुमको आती देख, बांसुरी रख, मैं चुप हो जाता...
एक बार मां कह, पत्‍तों में, धीरे से छिप जाता...

तुम हो चकित देखतीं, चारों ओर न मुझको पातीं...
व्‍या‍कुल सी हो तब, कदम्ब के नीचे तक आ जातीं...

पत्‍तों का मर-मर स्‍वर सुनकर, जब ऊपर आंख उठातीं...
मुझे देख ऊपर डाली पर, कितनी घबरा जातीं...

ग़ुस्‍सा होकर मुझे डांटतीं, कहतीं, नीचे आ जा...
पर जब मैं न उतरता, हंसकर कहतीं, मुन्‍ना राजा...

नीचे उतरो, मेरे भैया, तुम्‍हें मिठाई दूंगी...
नए खिलौने - माखन - मिश्री - दूध - मलाई दूंगी...

मैं हंसकर, सबसे ऊपर की, डाली पर चढ़ जाता...
वहीं कहीं पत्‍तों में छिपकर, फिर बांसुरी बजाता...

बहुत बुलाने पर भी मां जब, नहीं उतरकर आता...
मां, तब मां का हृदय तुम्हारा, बहुत विकल हो जाता...

तुम आंचल फैलाकर अम्मा, वहीं पेड़ के नीचे...
ईश्वर से कुछ विनती करतीं, बैठी आंखें मीचे...

तुम्हें ध्यान में लगी देख, मैं धीरे-धीरे आता...
और तुम्हारे, फैले आंचल के नीचे छिप जाता...

तुम घबराकर आंख खोलतीं, पर मां खुश हो जातीं...
जब अपने मुन्ना राजा को, गोदी में ही पातीं...

इसी तरह कुछ, खेला करते, हम-तुम धीरे-धीरे...
यह कदम्ब का पेड़, अगर मां, होता यमुना तीरे...

Tuesday, July 13, 2010

आज हमारी छुट्टी है... (श्यामसुन्दर अग्रवाल)

विशेष नोट : अपने पुत्र सार्थक और पुत्री निष्ठा को सिखाने के लिए सदा कुछ नया ढूंढता रहता हूं, सो, अचानक श्री श्यामसुन्दर अग्रवाल द्वारा लिखित यह कविता मिल गई... डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू.कविताकोश.ओआरजी (www.kavitakosh.org) के अनुसार श्री अग्रवाल का जन्म पंजाब के कोटकपुरा में हुआ था... श्री अग्रवाल हिन्दी और पंजाबी भाषा में कविताएं रचने के अतिरिक्त कहानियां और लघुकथाएं लिखने, उनके सम्पादन तथा अनुवाद करने के लिए भी जाने जाते हैं... श्री अग्रवाल पिछले 21 वर्ष से लघुकथाओं की पंजाबी त्रैमासिक पत्रिका 'मिन्नी' के संयुक्त सम्पादक भी हैं...

रविवार का प्यारा दिन है,
आज हमारी छुट्टी है...

उठ जाएंगे क्या जल्दी है,
नींद तो पूरी करने दो...
बड़ी थकावट हफ्ते भर की,
आराम ज़रूरी करने दो...

नहीं घड़ी की ओर देखना,
न करनी कोई भागम-भाग...
मनपसंद वस्त्र पहनेंगे,
आज नहीं वर्दी का राग...

खाएंगे आज गर्म परांठे,
और खेलेंगे मित्रों संग...
टीचर जी का डर न हो तो,
उठती मन में खूब उमंग...

होम-वर्क को नमस्कार,
और बस्ते के संग कुट्टी है...
मम्मी, कोई काम न कहना,
आज हमारी छुट्टी है...

Monday, April 12, 2010

बाल पहेलियां (पशु-पक्षी)... (विवेक रस्तोगी)

विशेष नोट : अपने एक स्कूली दोस्त संदीप गोयल (चार्टर्ड एकाउंटेंट) की फरमाइश पर उसके बच्चों के लिए कभी कुछ पहेलियां मैंने भी लिखी थीं... आज अचानक पुराने मेल देख रहा था, सो, याद आ गईं, और आप लोगों के सामने ले आया हूं... इस पोस्ट की पहेलियों के उत्तर इसी पोस्ट के अंत में देखें...

1.
चार पांव हैं, एक पूंछ है, अक्सर रहती मौन...
सुबह-शाम मैं दूध पिलाती, बतलाओ मैं कौन...

2.
जंगल का राजा कहलाता, सब हैं डरते मुझसे...
बोलो तुम मैं कौन हूं, वरना, खा जाऊंगा झट से...

3.
सुबह-शाम मैं बोझ उठाता, ढेंचूं-ढेंचूं करता हूं...
पीछे मत तुम आना मेरे, मार दुलत्ती भगता हूं...

4.
सबसे वजनी होता हूं मैं, इस धरती पर औरों से...
सूंड से पानी हूं पीता, चिंघाड़ मारता ज़ोरों से...

5.
मिर्ची खाता, सब दोहराता, प्यार सभी का पाता हूं...
हरे बदन पर लाल चोंच है, सबका मन हर्षाता हूं...

उत्तर :
1. गाय
2. शेर
3. गधा
4. हाथी
5. तोता

Wednesday, April 07, 2010

बाल पहेलियां (पशु-पक्षी)... (दीनदयाल शर्मा)

विशेष नोट : बच्चों को सिखाने के लिए सदा कुछ नया ढूंढता रहता हूं, सो, अचानक श्री दीनदयाल शर्मा द्वारा लिखित ये पहेलियां मिलीं... डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू.कविताकोश.ओआरजी (www.kavitakosh.org) के अनुसार श्री शर्मा का जन्म 15 जुलाई, 1956 को राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित नोहर तहसील के जसाना गांव में हुआ था... श्री शर्मा 'लंकेश्वर', 'महाप्रयाग', 'दिनेश्वर' आदि उपनामों से लेखन करते रहे हैं, तथा हिन्दी और राजस्थानी भाषाओं में शिशु-कविता और बाल-काव्य के क्षेत्र में जाना-पहचाना नाम हैं... इस पोस्ट की पहेलियों के उत्तर इसी पोस्ट के अंत में देखें...

1.
जंगल में हो या पिंजरे में,
रौब सदा दिखलाता,
मांसाहारी भोजन जिसका,
वनराजा कहलाता...

2.
गोल-गोल हैं जिसकी आंखें,
भाता नहीं उजाला,
दिन में सोता रहता हरदम,
रात विचरने वाला...

3.
हमने देखा अजब अचम्भा,
पैर हैं जैसे कोई खम्भा,
थुलथुल काया, बड़े हैं कान,
सूंड इसकी होती पहचान...

4.
सरस्वती की सफ़ेद सवारी,
मोती जिनको भाते,,
करते अलग दूध से पानी,
बोलो कौन कहाते...

5.
कान बड़े हैं, काया छोटी,
कोमल-कोमल बाल,
चौकस इतना पकड़ सके न,
बड़ी तेज़ है चाल...

6.
राग सुरीली रंग से काली,
सबके मन को भाती,
बैठ पेड़ की डाली पर जो,
मीठे गीत सुनाती...

7.
सुबह-सवेरे घर की छत पर,
करता कांव-कांव,
काले रंग में रंगा है पंछी,
मिलता गांव-गांव...

8.
कुकडूं-कूं जो बोला करता,
सबको सुबह जगाता,
सर पर लाल कलंगी वाला,
गांव घड़ी कहलाता...

9.
नर पंछी नारी से सुन्दर,
वर्षा में नाच दिखाता,
मनमोहक कृष्ण को प्यारा,
राष्ट्र पक्षी कहलाता...

10.
हरी ड्रेस और लाल चोंच है,
रटना जिसका काम,
कुतर-कुतरकर फल खाता है,
लेता हरि का नाम...

11.
गले में कम्बल, पीठ पर थुथनी,
रखती है थन चार,
दूध, घी और देती बछड़ा,
करते हम सब प्यार...

12.
बोझा ढोता है जो दिन भर,
करता नहीं पुकार,
मालिक दो होते हैं जिसके,
धोबी और कुम्हार...

13.
चोरों पर जो झपटा करता,
घर का है रखवाला,
इसकी भौं-भौं से डर जाता,
चाहे हो दिलवाला...

14.
लम्बी गर्दन, पीठ पर कूबड़,
घड़ों पानी पी जाए,
टीलों पर जो सरपट दौड़े,
मरुथल जहाज़ कहाए...

15.
तांगा, बग्घी, रथ चलाते,
मन करे तो हिनहिनाते,
चने चाव से खाते हैं,
खड़े-खड़े सो जाते हैं...

16.
टर्र-टर्र जो टर्राते हैं,
जैसे गीत सुनाते,
जब ये जल में तैरा करते,
पग पतवार बनाते...

17.
चर-चर करती, शोर मचाती,
पेड़ों पर चढ़ जाती,
काली पत्तियां तीन पीठ पर,
कुतर-कुतर फल खाती...

18.
छोटे तन में गांठ लगी है,
करे जो दिन भर काम,
आपस में जो हिलमिल रहती,
नहीं करती आराम...

19.
पानी में ख़ुश रहता हरदम,
धीमी जिसकी चाल,
ख़तरा पाकर सिमट जाए झट,
बन जाता खुद ढाल...

20.
छत से लटकी मिल जाती है,
छह पग वाली नार,
बुने लार से मलमल जैसे,
कपड़े जालीदार...

उत्तर :
1. शेर
2. उल्लू
3. हाथी
4. हंस
5. खरगोश
6. कोयल
7. कौवा
8. मुर्गा
9. मोर
10. तोता
11. गाय
12. गधा
13. कुत्ता
14. ऊंट
15. घोड़ा
16. मेंढक
17. गिलहरी
18. चींटी
19. कछुआ
20. मकड़ी

बाल पहेलियां (वस्तु-व्यक्ति)... (दीनदयाल शर्मा)

विशेष नोट : बच्चों को सिखाने के लिए सदा कुछ नया ढूंढता रहता हूं, सो, अचानक श्री दीनदयाल शर्मा द्वारा लिखित ये पहेलियां मिलीं... डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू.कविताकोश.ओआरजी (www.kavitakosh.org) के अनुसार श्री शर्मा का जन्म 15 जुलाई, 1956 को राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित नोहर तहसील के जसाना गांव में हुआ था... श्री शर्मा 'लंकेश्वर', 'महाप्रयाग', 'दिनेश्वर' आदि उपनामों से लेखन करते रहे हैं, तथा हिन्दी और राजस्थानी भाषाओं में शिशु-कविता और बाल-काव्य के क्षेत्र में जाना-पहचाना नाम हैं... इस पोस्ट की पहेलियों के उत्तर इसी पोस्ट के अंत में देखें...

1.
मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारा,
सभी जगह सम्मान यह पाए,
पतली सी है काया जिसकी,
जलती हुई महक फैलाए...

2.
अलग-अलग रहती हैं दोनों,
नाम एक-सा प्यारा,
एक महक फैलाए जग में,
दूजी करे उजियारा...

3.
दिन-रात मैं चलती रहती,
न लेती थकने का नाम,
जब भी पूछो समय बताती,
देती बढ़ने का पैगाम...

4.
जैसे हो तुम दिखोगे वैसे,
मेरे भीतर झांको,
झट से दे दो उत्तर इसका,
खुद को कम न आंको...

5.
तमिलनाडु, दक्षिण भारत के,
वैज्ञानिक ने किया कमाल,
अग्नि और पृथ्वी मिसाइल,
जिनकी देखो ठोस मिसाल...

उत्तर:
1. अगरबत्ती
2. धूप
3. घड़ी
4. दर्पण
5. डॉ एपीजे अब्दुल क़लाम

Monday, April 05, 2010

मेरा नया बचपन... (सुभद्राकुमारी चौहान)

विशेष नोट : यह कविता काफी पहले पढ़ी थी, लेकिन अपनी बेटी निष्ठा के होने के बाद जब इसे ढूंढना चाहा तो मिल नहीं पाई... आज अचानक ही एक पुराने साथी (शुक्रिया, आलोक भटनागर...) ने यह मुझे भेजी, सो, अब आप सब लोगों के लिए भी अपने ब्लॉग पर ले आया हूं...


बार-बार आती है मुझको, मधुर याद बचपन तेरी...
गया, ले गया, तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी...

चिंता-रहित खेलना-खाना, वह फिरना निर्भय स्वच्छंद...
कैसे भूला जा सकता है, बचपन का अतुलित आनंद...

ऊंच-नीच का ज्ञान नहीं था, छुआछूत किसने जानी...
बनी हुई थी वहां झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी...

किए दूध के कुल्ले मैंने, चूस अंगूठा सुधा पिया...
किलकारी-किल्लोल मचाकर, सूना घर आबाद किया...

रोना और मचल जाना भी, क्या आनंद दिखाते थे...
बड़े-बड़े मोती-से आंसू, जयमाला पहनाते थे...

मैं रोई, मां काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया...
झाड़-पोंछकर चूम-चूम, गीले गालों को सुखा दिया...

दादा ने चंदा दिखलाया, नेत्र नीर-युत दमक उठे...
धुली हुई मुस्कान देखकर, सबके चेहरे चमक उठे...

वह सुख का साम्राज्य छोड़कर, मैं मतवाली बड़ी हुई...
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी, दौड़ द्वार पर खड़ी हुई...

लाजभरी आंखें थीं मेरी, मन में उमंग रंगीली थी...
तान रसीली थी, कानों में, चंचल छैल-छबीली थी...

दिल में एक चुभन-सी थी, यह दुनिया अलबेली थी...
मन में एक पहेली थी, मैं सबके बीच अकेली थी...

मिला, खोजती थी जिसको, हे बचपन! ठगा दिया तूने...
अरे! जवानी के फंदे में मुझको फंसा दिया तूने...

सब गलियां उसकी भी देखीं, उसकी खुशियां न्यारी हैं...
प्यारी, प्रीतम की रंगरलियों की स्मृतियां भी प्यारी हैं...

माना मैंने, युवा-काल का जीवन खूब निराला है...
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहने वाला है...

किंतु यहां झंझट है भारी, युद्ध-क्षेत्र संसार बना...
चिंता के चक्कर में पड़कर, जीवन भी है भार बना...

आ जा बचपन! एक बार फिर, दे दे अपनी निर्मल शांति...
व्याकुल व्यथा मिटाने वाली, वह अपनी प्राकृत विश्रांति...

वह भोली-सी मधुर सरलता, वह प्यारा जीवन निष्पाप...
क्या आकर फिर मिटा सकेगा, तू मेरे मन का संताप...

मैं बचपन को बुला रही थी, बोल उठी बिटिया मेरी...
नंदनवन-सी फूल उठी, यह छोटी-सी कुटिया मेरी...

'मां ओ' कहकर बुला रही थी, मिट्टी खाकर आई थी...
कुछ मुंह में, कुछ लिए हाथ में, मुझे खिलाने लाई थी...

पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतूहल था छलक रहा...
मुंह पर थी आह्लाद-लालिमा, विजय-गर्व था झलक रहा...

मैंने पूछा 'यह क्या लाई', बोल उठी वह 'मां, काओ'...
हुआ प्रफुल्लित हृदय, खुशी से मैंने कहा - 'तुम्हीं खाओ'...

पाया मैंने बचपन फिर से, बचपन बेटी बन आया...
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर, मुझमें नवजीवन आया...

मैं भी उसके साथ, खेलती-खाती हूं, तुतलाती हूं...
मिलकर उसके साथ, स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूं...

जिसे खोजती थी बरसों से, अब जाकर उसको पाया...
भाग गया था मुझे छोड़कर, वह बचपन फिर से आया...

Thursday, March 04, 2010

मेरे घर आई एक नन्ही परी... (कभी-कभी)

विशेष नोट : मुझे बेहद पसंद है यह फिल्मी गीत... परिवार में सिर्फ हम तीन भाइयों के होने की वजह से सभी की इच्छा थी कि घर में बेटी होनी चाहिए, और वह हसरत मेरी बेटी के आने से पूरी हो गई... सो, यह कविता (या गीत कह लीजिए) मेरी बेटी निष्ठा को समर्पित कर रहा हूं... इस गीत का मैंने अंग्रेज़ी में अनुवाद भी कर दिया है, ताकि गैर-हिन्दी भाषी भी इसकी खूबसूरत भावनाओं को समझ सकें... 


फिल्म - कभी कभी 
पार्श्वगायक - लता मंगेशकर 
संगीत निर्देशक - खय्याम 
गीतकार - साहिर लुधियानवी

मेरे घर आई एक नन्ही परी...
चांदनी के हसीन रथ पे सवार...
मेरे घर आई... होSSSSS...
मेरे घर आई एक नन्ही परी... 

A little fairy has come to my home...
Mounted on the moonlight's beautiful chariot...

उसकी बातों में शहद जैसी मिठास,
उसकी सांसों में इतर की महकास...
होंठ जैसे कि भीगे-भीगे गुलाब,
गाल जैसे कि दहके-दहके अनार... 

There's the sweetness of honey in her words...
The sweet fragrance of perfume in her breath...
Her lips are like the wet rose petals...
And her cheeks are like ripe pomegranates...

मेरे घर आई... होSSSSS...
मेरे घर आई एक नन्ही परी... 

A little fairy has come to my home...

उसके आने से मेरे आंगन में,
खिल उठे फूल, गुनगुनाई बहार...
देखकर उसको जी नहीं भरता,
चाहे देखूं उसे, हज़ारों बार... 

As she comes to my home...
The flowers blossomed, and the spring arrived...
I am not able to feel satisfied seeing her,
Even if I see her a thousand times...

मेरे घर आई... होSSSSS...
मेरे घर आई एक नन्ही परी...

A little fairy has come to my home...

मैने पूछा उसे कि कौन है तू,
हंस के बोली कि मैं हूं तेरा प्यार...
मैं तेरे दिल में थी हमेशा से,
घर में आई हूं आज पहली बार... 

I asked her, "Who are you...?"
With a laugh, she said, "Your love..."
"I have lived in your heart since forever..."
"Though have come to your home for the first time..."

मेरे घर आई... होSSSSS...
मेरे घर आई एक नन्ही परी... 

A little fairy has come to my home...

Friday, January 22, 2010

काली भेड़... Ba Ba Black Sheep... (विवेक रस्तोगी)

विशेष नोट : मेरे पुत्र सार्थक के स्कूल में उसे अंग्रेज़ी की बाल कविता (Nursery rhyme) 'Ba Ba Black Sheep' सिखाई गई... सर्दियों की छुट्टियों में जब वह दिल्ली आया, तो मैंने कुछ नया सिखाने के उद्देश्य से उसी कविता का हिन्दी अनुवाद कर दिया, और मज़े की बात यह है कि अब वह अंग्रेज़ी के बजाए हिन्दी की कविता सुनाता है...


Ba Ba black sheep...
Have you any wool...
Yes sir... Yes sir...
Three bags full...
One for my master...
One for the dame...
One for the little boy...
Who lives down the lane...

अब इसी का अनुवाद, जो मैंने अपने बेटे को सिखाया...

काली भेड़, काली भेड़...
ऊन है क्या तेरे पास...
हां जी, हां जी...
पूरे तीन थैले खास...
एक थैला मालिक का...
एक है सहेली का...
एक थैला सार्थक का...
जो घोंचूराम बरेली का...


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