Wednesday, April 07, 2010

जलियांवाला बाग में बसंत... (सुभद्राकुमारी चौहान)

विशेष नोट : बचपन में सभी बच्चों की तरह मैंने भी सुभद्राकुमारी चौहान रचित 'झांसी की रानी' पढ़ी थी... बेहद पसंद आई, सो, इनकी अन्य कविताएं पढ़ने को भी मन ललचाता रहा... ढूंढता रहा हूं, और पढ़ता रहा हूं... एक कविता यह भी है, जो मुझे अच्छी लगती है, सो, आप सबके साथ भी बांट रहा हूं...

यहां कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते...

कलियां भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे...

परिमल-हीन पराग दाग-सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है...

ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान, यहां मत शोर मचाना...

वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ाकर मत ले जाना...

कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार, कष्ट की कथा सुनावें...

लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले...

किन्तु न तुम उपहार भाव आकर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना...

कोमल बालक मरे यहां गोली खाकर,
कलियां उनके लिए गिराना थोड़ी लाकर...

आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं...

कुछ कलियां अधखिली यहां इसलिए चढ़ाना,
करके उनकी याद अश्रु के ओस बहाना...

तड़प-तड़पकर वृद्ध मरे हैं, गोली खाकर,
शुष्क पुष्प कुछ वहां गिरा देना तुम जाकर...

यह सब करना, किन्तु यहां मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान, बहुत धीरे से आना...

4 comments:

  1. पहले बार पढ़ी है यह कविता .
    बहुत पसंद आई.

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  2. अल्पना जी... जानकर खुशी हुई कि आपको कविताओं में भी रुचि है... अन्य कविताएं, और विशेषकर भजन-प्रार्थनाएं आदि भी पढ़ें इसी ब्लॉग में, और बताएं, कैसे लगे...

    और हां, पहेलियां भी लगातार अपडेट कर रहा हूं, अब वहां पहुंचने की फुर्सत नहीं मिल पाती क्या...?

    ReplyDelete

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