विशेष नोट : एक वक्त था, जब मैं भी अपने दादाजी, ताऊजी और पिता की तरह अपने अंदर के कवि (और शायद शायर भी) से परिचय बना रहा था... बहुत समय से सोच रहा था कि आप सबको भी बताऊं कि मैं कितना 'बेकार' शायर हुआ करता था... लेकिन फिर सोचा, अशार (शेर) कैसे भी हों, भाव तो आप लोगों के साथ बांट ही सकता हूं, सो, पेश हैं मेरे लिखे कुछ अशार...
न मिल पाई दवा कोई, उन हिकमत की किताबों में...
ये अलामत है तग़ाफ़ुल, औ' नज़र दरकार है...
(दिसम्बर 9, 2009)
तेरे दिल में हैं बैठे जो, ग़मों को दूर कर दूंगा...
फ़कत इक बार मुझको दिल से अपना मान लेना तू...
(27 अगस्त, 2009)
तेरे चेहरे का खिलना देखना काफी नहीं रहा...
सुनाई दे जो कुछ दिल की हंसी, तो बात बने...
(27 अगस्त, 2009)
होंठों पे हंसी हो तो मेरे काम की नहीं...
मैं तेरी आंखों में खुशी देखना चाहूं...
(27 अगस्त, 2009)
होंठों पे हंसी हो तो मेरे काम की नहीं...
मुस्कुराहट वो, जो आंखों से झलके है...
(27 अगस्त, 2009)
रस्मे-दुनिया से तो मैं काफ़िर ही कहा जाऊंगा,
बुतपरस्ती न सही, तेरे सामने सजदा किया...
(1 फरवरी, 1996)
ताहयात याद तेरी साथ रही, शाद था,
आज मैं डरता हूं, जो, आई क़ज़ा, तो होगा क्या...
(2 फरवरी, 1996)
ग़ुरबत में तेरी, ग़िज़ा मेरी, हो गई सबसे जुदा,
मुट्ठी ग़म है खाने को, औ' प्याला आंसू पीने को...
(2 फरवरी, 1996)
तिरे रूठे से, मिरी जान चली जाएगी, सोचा किए,
प्यार से मुझे तूने देखा, जान तो फिर भी गई...
(3 फरवरी, 1996)
जब तक न मुझको छोड़ दे तू, मैं करूं कैसे गिला,
दिल के भीतर ही सही, मेरे साथ तो रहती है तू...
(5 फरवरी, 1996)
तेरी क़ुरबत और ग़ुरबत, हो गई हैं एक सी,
लगे है ख़्वाब तू आए, जो आए ख़्वाब तू आए...
(6 फरवरी, 1996)
रहके तुझसे दूर मुझसे, ज़िंदगी कटती न थी,
मिल गए हो तुम, ये अब और भी मुश्किल लगे...
(20 फरवरी, 1996)
आपकी नज़रें ही हैं ये खूबसूरत, जान लो,
वरना मेरी शक्लो-सूरत में तो कुछ भी है नहीं...
(17 जून, 1996)

बचपन से ही कविताओं का शौकीन रहा हूं, व नानी, मां, मौसियों के संस्कृत श्लोक व भजन भी सुनता था... कुछ का अनुवाद भी किया है... वैसे यहां अनेक रचनाएं मौजूद हैं, जिनमें कुछ के बोल मार्मिक हैं, कुछ हमें गुदगुदाते हैं... और हां, यहां प्रकाशित प्रत्येक रचना के कॉपीराइट उसके रचयिता या प्रकाशक के पास ही हैं... उन्हें श्रेय देकर ही इन रचनाओं को प्रकाशित कर रहा हूं, परंतु यदि किसी को आपत्ति हो तो कृपया vivek.rastogi.2004@gmail.com पर सूचना दें, रचना को तुरंत हटा लिया जाएगा...
Saturday, July 18, 2009
कभी मेरे अंदर भी एक शायर था... (विवेक रस्तोगी)
Friday, July 17, 2009
हे भगवन, मुझे गधा बना दे... (राम अवतार रस्तोगी 'शैल')
विशेष नोट : अधिकतर बच्चों की तरह मेरे आदर्श भी मेरे पिता ही रहे हैं... सरकारी नौकरी छोड़कर मेरे पत्रकार बन जाने की एकमात्र वजह भी यही थी कि वह पत्रकार थे... अपने कॉलेज के समय में वह 'शैल' उपनाम से कविता भी किया करते थे, सो, आज उनकी डायरी से एक हास्य कविता आप सबके लिए प्रस्तुत कर रहा हूं... यह कविता उनकी डायरी के मुताबिक 28 दिसम्बर, 1964 को लिखी गई थी...
बहुत सोचता हूं, मगर कैसे हो यह,
मुझे मेरा स्वामी गधा इक बना दे...
जानता हूं, हंसोगे, हंसो खूब खुलकर,
मगर मुझको भगवन, गधा अब बना दे...
है बर्दाश्त कितनी, यह सब कुछ है सहता,
कोई दे ले गाली, या फिर पीट डाले,
नहीं चूं करेगा, कभी यह बेचारा,
मुझे मेरे भगवन, गधा अब बना दे...
मार कब तक सहूं, अपनी बीवी की हरदम,
औ' बच्चे मेरे, मुझको आंखें दिखाते,
इसी से तमन्ना यह भारी मेरी है,
मुझे मेरे भगवन, गधा अब बना दे...
जो विद्वान होगा, वह गंभीर होगा,
इसे हम यहां पर सदा सत्य पाते,
गधे-सा नहीं और गंभीर होता,
मुझे मेरे भगवन, गधा अब बना दे...
दफ्तर में गाली सहूं बॉस की मैं,
घर में बच्चों की अपने सवारी बनूं मैं,
बीवी का प्यारा रहूं मैं हमेशा,
अगर मुझको भगवन, गधा अब बना दे...
बहुत सोचता हूं, मगर कैसे हो यह,
मुझे मेरा स्वामी गधा इक बना दे...
जानता हूं, हंसोगे, हंसो खूब खुलकर,
मगर मुझको भगवन, गधा अब बना दे...
है बर्दाश्त कितनी, यह सब कुछ है सहता,
कोई दे ले गाली, या फिर पीट डाले,
नहीं चूं करेगा, कभी यह बेचारा,
मुझे मेरे भगवन, गधा अब बना दे...
मार कब तक सहूं, अपनी बीवी की हरदम,
औ' बच्चे मेरे, मुझको आंखें दिखाते,
इसी से तमन्ना यह भारी मेरी है,
मुझे मेरे भगवन, गधा अब बना दे...
जो विद्वान होगा, वह गंभीर होगा,
इसे हम यहां पर सदा सत्य पाते,
गधे-सा नहीं और गंभीर होता,
मुझे मेरे भगवन, गधा अब बना दे...
दफ्तर में गाली सहूं बॉस की मैं,
घर में बच्चों की अपने सवारी बनूं मैं,
बीवी का प्यारा रहूं मैं हमेशा,
अगर मुझको भगवन, गधा अब बना दे...
श्रद्धांजलि लालबहादुर शास्त्री को... (राम अवतार रस्तोगी 'शैल')
विशेष नोट : अधिकतर बच्चों की तरह मेरे आदर्श भी मेरे पिता ही रहे हैं... सरकारी नौकरी छोड़कर मेरे पत्रकार बन जाने की एकमात्र वजह भी यही थी कि वह पत्रकार थे... अपने कॉलेज के समय में वह 'शैल' उपनाम से कविता भी किया करते थे, सो, आज उनकी डायरी से एक कविता आप सबके लिए प्रस्तुत कर रहा हूं... यह कविता उनकी डायरी के मुताबिक 11 जनवरी, 1966 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु का समाचार प्राप्त होने के कुछ मिनट पश्चात लिखी गई थी...
जननी के गौरव के रक्षक,
ओ शांतिवीर, ओ कर्मवीर,
भारत-भर के सुन्दर प्रतीक,
ओ लालबहादुर, शूरवीर...
जन-मन के ओ प्रियतम नेता,
मेरे भारत के हृदय-सम्राट,
अर्पित मेरे श्रद्धाप्रसून,
स्वीकार करो वामन-विराट...
साधारण-जन के कुलदीपक,
मानवता के अभिनव प्रहरी,
है नमस्कार तुमको जन का,
स्वीकार करो मानव-केहरी...
जननी के गौरव के रक्षक,
ओ शांतिवीर, ओ कर्मवीर,
भारत-भर के सुन्दर प्रतीक,
ओ लालबहादुर, शूरवीर...
जन-मन के ओ प्रियतम नेता,
मेरे भारत के हृदय-सम्राट,
अर्पित मेरे श्रद्धाप्रसून,
स्वीकार करो वामन-विराट...
साधारण-जन के कुलदीपक,
मानवता के अभिनव प्रहरी,
है नमस्कार तुमको जन का,
स्वीकार करो मानव-केहरी...
प्रियतमे विषाद का स्वर है यह... (राम अवतार रस्तोगी 'शैल')
विशेष नोट : अधिकतर बच्चों की तरह मेरे आदर्श भी मेरे पिता ही रहे हैं... सरकारी नौकरी छोड़कर मेरे पत्रकार बन जाने की एकमात्र वजह भी यही थी कि वह पत्रकार थे... अपने कॉलेज के समय में वह कविता भी किया करते थे, सो, आज उनकी डायरी से एक कविता आप सबके लिए प्रस्तुत कर रहा हूं... यह कविता उनकी डायरी के मुताबिक 28 जनवरी, 1964 को लिखी गई, जब वे एमए में पढ़ते थे...
प्रियतमे विषाद का स्वर है यह,
इसमें तुम खोज सकोगी क्या...?
निःश्वास भरा इसमें साथिन,
तब पा तुम प्यार सकोगी क्या...?
दुःखमय नीरव तानें इसकी,
उनको तुम खैंच सकोगी क्या...?
जो फिर स्वर से अभिप्रेतनीय,
उसको तुम भांप सकोगी क्या...?
मेरे स्वर में जो कातरता,
उसको दे धीर सकोगी क्या...?
नैराश्य भरा जो इस स्वर में,
उसकी हर पीर सकोगी क्या...?
मेरे श्वासों में क्रन्दन है,
उसको दे धैर्य सकोगी क्या...?
मेरे यौवन में सूनापन,
उसका दे साथ सकोगी क्या...?
कम्पन जो स्वर के अन्तस में,
उसको तुम बांध सकोगी क्या...?
अन्तर जो अन्तर्द्वद्वों में,
उसको तुम पाट सकोगी क्या...?
प्रियतमे विषाद का स्वर है यह,
इसमें तुम खोज सकोगी क्या...?
प्रियतमे विषाद का स्वर है यह,
इसमें तुम खोज सकोगी क्या...?
निःश्वास भरा इसमें साथिन,
तब पा तुम प्यार सकोगी क्या...?
दुःखमय नीरव तानें इसकी,
उनको तुम खैंच सकोगी क्या...?
जो फिर स्वर से अभिप्रेतनीय,
उसको तुम भांप सकोगी क्या...?
मेरे स्वर में जो कातरता,
उसको दे धीर सकोगी क्या...?
नैराश्य भरा जो इस स्वर में,
उसकी हर पीर सकोगी क्या...?
मेरे श्वासों में क्रन्दन है,
उसको दे धैर्य सकोगी क्या...?
मेरे यौवन में सूनापन,
उसका दे साथ सकोगी क्या...?
कम्पन जो स्वर के अन्तस में,
उसको तुम बांध सकोगी क्या...?
अन्तर जो अन्तर्द्वद्वों में,
उसको तुम पाट सकोगी क्या...?
प्रियतमे विषाद का स्वर है यह,
इसमें तुम खोज सकोगी क्या...?
Monday, July 13, 2009
फूल और कांटा... (अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध')
विशेष नोट : हाल ही में एक सहयोगी ने अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की कविता 'एक बूंद' का ज़िक्र अपने फेसबुक एकाउंट पर किया, सो, मुझे यह दूसरी कविता भी याद आ गई... यह कविता भी मैंने बचपन में पढ़ी थी, और दार्शनिकता का समावेश है इसमें...
हैं जनम लेते जगह में एक ही,
एक ही पौधा उन्हें है पालता,
रात में उन पर चमकता चांद भी,
एक ही सी चांदनी है डालता...
मेह उन पर है बरसता एक-सा,
एक-सी उन पर हवाएं हैं बहीं,
पर सदा ही यह दिखाता है हमें,
ढंग उनके एक-से होते नहीं...
छेद कर कांटा किसी की उंगलियां,
फाड़ देता है किसी का वर वसन,
प्यार-डूबी तितलियों का पर कतर,
भौंरें का है बेध देता श्याम तन...
फूल लेकर तितलियों को गोद में,
भौंरें को अपना अनूठा रस पिला,
निज सुगंधों औ निराले रंग से,
है सदा देता कली जी की खिला...
है खटकता एक सबकी आंख में,
दूसरा है सोहता सुर-सीस पर,
किस तरह कुल की बड़ाई काम दे,
जो किसी में हो बड़प्पन की कसर...
हैं जनम लेते जगह में एक ही,
एक ही पौधा उन्हें है पालता,
रात में उन पर चमकता चांद भी,
एक ही सी चांदनी है डालता...
मेह उन पर है बरसता एक-सा,
एक-सी उन पर हवाएं हैं बहीं,
पर सदा ही यह दिखाता है हमें,
ढंग उनके एक-से होते नहीं...
छेद कर कांटा किसी की उंगलियां,
फाड़ देता है किसी का वर वसन,
प्यार-डूबी तितलियों का पर कतर,
भौंरें का है बेध देता श्याम तन...
फूल लेकर तितलियों को गोद में,
भौंरें को अपना अनूठा रस पिला,
निज सुगंधों औ निराले रंग से,
है सदा देता कली जी की खिला...
है खटकता एक सबकी आंख में,
दूसरा है सोहता सुर-सीस पर,
किस तरह कुल की बड़ाई काम दे,
जो किसी में हो बड़प्पन की कसर...
एक बूंद... (अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध')
विशेष नोट : हाल ही में एक सहयोगी ने अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की इस कविता का ज़िक्र अपने फेसबुक एकाउंट पर किया... यह कविता मैंने बचपन में पढ़ी थी, और बेहद खूबसूरत रचना है...
ज्यों निकल कर बादलों की गोद से,
थी अभी एक बूंद कुछ आगे बढ़ी,
सोचने फिर-फिर यही जी में लगी,
आह! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी...?
देव! मेरे भाग्य में क्या है बदा,
मैं बचूंगी या मिलूंगी धूल में?
या जलूंगी फिर अंगारे पर किसी,
चू पडूंगी या कमल के फूल में...?
बह गई उस काल एक ऐसी हवा,
वह समुन्दर ओर आई अनमनी,
एक सुन्दर सीप का मुंह था खुला,
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी...
लोग यों ही हैं झिझकते, सोचते,
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर,
किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें,
बूंद लौं कुछ और ही देता है कर...
ज्यों निकल कर बादलों की गोद से,
थी अभी एक बूंद कुछ आगे बढ़ी,
सोचने फिर-फिर यही जी में लगी,
आह! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी...?
देव! मेरे भाग्य में क्या है बदा,
मैं बचूंगी या मिलूंगी धूल में?
या जलूंगी फिर अंगारे पर किसी,
चू पडूंगी या कमल के फूल में...?
बह गई उस काल एक ऐसी हवा,
वह समुन्दर ओर आई अनमनी,
एक सुन्दर सीप का मुंह था खुला,
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी...
लोग यों ही हैं झिझकते, सोचते,
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर,
किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें,
बूंद लौं कुछ और ही देता है कर...
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