आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
पर अंधेरा देख तू, आकाश के तारे न देख...
एक दरिया है यहां पर, दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाज़ुओं को देख, पतवारें न देख...
अब यकीनन ठोस है धरती, हकीकत की तरह,
यह हकीकत देख, लेकिन खौफ के मारे न देख...
वे सहारे भी नहीं, अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ, उन हाथों में तलवारें न देख...
ये धुंधलका है नज़र का, तू महज़ मायूस है,
रोजनों को देख, दीवारों में दीवारें न देख...
राख कितनी राख है, चारों तरफ बिखरी हुई,
राख में चिनगारियां ही देख, अंगारे न देख...


दुष्यंत जी की कवितायेँ मुझे भी बहुत पसंद हैं.
ReplyDeleteयह प्रस्तुति भी बहुत अच्छा चयन है.
शुक्रिया, अल्पना जी... :-)
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