विशेष नोट : आजकल के शायरों में बशीर बद्र की कलम मुझे पसंद आती है... सो, उनकी यह ग़ज़ल आपकी नज़र कर रहा हूं...
मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला,
अगर गले नहीं मिलता, तो हाथ भी न मिला...
घरों पे नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे,
बहुत तलाश किया, कोई आदमी न मिला...
तमाम रिश्तों को मैं, घर में छोड़ आया था,
फिर इसके बाद मुझे, कोई अजनबी न मिला...
ख़ुदा की इतनी बड़ी कायनात में मैंने,
बस एक शख़्स को मांगा, मुझे वही न मिला...
बहुत अजीब है ये कुरबतों की दूरी भी,
वो मेरे साथ रहा, और मुझे कभी न मिला...
Thursday, September 10, 2009
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