विशेष नोट : गर्मी की छुट्टियों के दौरान बच्चों को कुछ नया सिखाने के उद्देश्य से कविताकोश.ओआरजी पर आया था, और वहां रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी की लिखी यह कविता मिली... अच्छी लगी, सो, आप लोग भी पढ़ लें...
धक्का-मुक्की, रेलम-पेल,
आई रेल, आई रेल...
इंजन चलता सबसे आगे,
पीछे-पीछे डिब्बे भागे...
हॉर्न बजाता, धुआं छोड़ता,
पटरी पर यह तेज़ दौड़ता...
जब स्टेशन आ जाता है,
सिग्नल पर रुक जाता है...
जब तक बत्ती लाल रहेगी,
इसकी ज़ीरो चाल रहेगी...
हरा रंग जब हो जाता है,
तब आगे को बढ़ जाता है...
बच्चों को यह बहुत सुहाती,
नानी के घर तक ले जाती...
छुक-छुक करती आती रेल,
आओ मिलकर खेलें खेल...
धक्का-मुक्की, रेलम-पेल,
आई रेल, आई रेल...
आई रेल, आई रेल...
इंजन चलता सबसे आगे,
पीछे-पीछे डिब्बे भागे...
हॉर्न बजाता, धुआं छोड़ता,
पटरी पर यह तेज़ दौड़ता...
जब स्टेशन आ जाता है,
सिग्नल पर रुक जाता है...
जब तक बत्ती लाल रहेगी,
इसकी ज़ीरो चाल रहेगी...
हरा रंग जब हो जाता है,
तब आगे को बढ़ जाता है...
बच्चों को यह बहुत सुहाती,
नानी के घर तक ले जाती...
छुक-छुक करती आती रेल,
आओ मिलकर खेलें खेल...
धक्का-मुक्की, रेलम-पेल,
आई रेल, आई रेल...
